Happy{vani} Rajput

Others


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आखिर ढूंढ लिया मैंने खुद को

आखिर ढूंढ लिया मैंने खुद को

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"शीला चलो तुम्हे मैनेजर साहब बुला रहे हैं|" साहिल ने कहा


शीला अपने डेस्क से उठी और मैनेजर के रूम की तरफ बढ़ चली। "में आई कमिन सर......" शीला ने कहा


"हाँ! आओ शीला। .. शीला मुझे तुम्हे बताना है कि कंपनी में कम प्रोजेक्ट्स होने की वजह से कुछ एम्प्लाइज को निष्कासित कर रहे हैं...... उस लिस्ट में तुम्हारा भी नाम है। .. तीन महीने का समय मिलेगा तुमको तबतक कही दूसरी नौकरी देख लो.... उसके बाद कभी ज़रूरत पड़ेगी तो तुम्हे बुला लेंगे|" मैनेजर ने कहा।


"पर...... पर मैं ही क्यों सर ? मैंने इतनी मेहनत और लगन से काम किया।अपने १२ साल इस कंपनी को दिए और आज बिना किसी कारण मुझे क्यों निकाल रहे हैं|" शीला ने रुआंसे हो कर कहा


"देखो शीला कंपनी में अब काम ख़त्म हो गया है। और कुछ रूल्स तुमने भी तोड़े हैं। समय पर न आना देर से आना और जल्दी चले जाना। कंपनी के रूल्स के खिलाफ है। अपना रेसिग्नेशन जमा करा दो। " मैनेजर ने कहा


"ओके सर!" इसके बाद शीला कुछ न कह सकी और तुरंत रूम से बाहर आ गई | मन रुआंसा हो गया था। सोचने लगी शायद मेरी ही गलती होगी। आज समय मेरे ऊपर भरी पड़ गया। मेहनत और अच्छे काम की कोई कदर नहीं अगर कोई समय पे ऑफिस न पहुंचे और देर तक न रुके। घर पहुँच कर उसने अपने पति राकेश को बताया। "मम्मी! क्या हो गया आप क्यों रो रही हो ?" बच्चों ने पुछा। राकेश कुछ देर तो चुप रहा।

"कुछ नहीं बेटा। जाओ आप खेलो दोनों। अभी खाना बनाती हूँ। " शीला ने कहा


शीला के दो बच्चे थे (पिंकी और चीकू) ६ और ५ साल के। दोनों डे केयर जाते थे। शीला ऑफिस से घर इनको ही लेते हुए जाती थी। "राकेश अब क्या करेंगे? घर का लोन तो मेरे नाम पर है। और फिर पॉलिसीस, किश्तें कहाँ से भरेंगे ?" शीला ने परेशानी वाले स्वर में पुछा।


"तुम्ही उनसे माफ़ी मांग लेती। क्यों देर से पहुंचती थीं। रोटी के लिए मेड लगी थी। पुरे खाने के लिए भी लगा लेती। देखो घर की किश्त , पॉलिसीस , स्कूल फीस तो सब भर जायेगा पर कुछ भी जो तुम्हारी तन्खाव्ह से बचता था वह अब नहीं बचेगा, अब हम लोन जल्दी नहीं चुका सकते। और फिर मेरी भी कौन सी सरकारी नौकरी है । " राकेश थोड़ा उखड़े स्वर में बोला।


"पर..... राकेश, मेड तो बस रोटी बनाती थी और बर्तन धोती थी। बाकि घर की साफ़ सफाई,कपडे धुलाई, बच्चों की पढाई , बाकि खाना बनाना और भी कई छोटे मोटे काम मेरे लिए होते हैं। केवल रोटी का ही काम करने से काम खत्म नहीं हो जाते। बच्चों को लेने की ज़िम्मेदारी भी मुझपे थी। कभी बॉस बोलता भी था कि आज रुकना है तो रुक ही नहीं पाती थी। हमेशा अपनी मीटिंग का कहके तुम तो पीछा छुड़ा लेते थे। कितना करती। रोज़ रोज़ वही टाइम का रोना। आईटी डिपार्टमेंट में प्रोग्रामर की जॉब में कनसंट्रेशन चाहिए होता है। जाने का टाइम होता है पर आने का नहीं। " शीला ने भी थोड़ा उखड़े स्वर में कहा।


"तुम्हे तो बस मैं काम करता हुआ नहीं दिखता। मैं भी जल्दी आता तो मेरी भी नौकरी चली जाती। वैसे भी ज़्यादा तनखाह की नौकरी है मेरी। अब दिन-रात और मेहनत करनी पड़ेगी।" कहके राकेश चला गया .....


शीला ने डे केयर से बच्चे निकलवा लिए और घर के सारे काम खुद ही करने लगी अपना मन व्यस्त रखने के लिए। उसने खाना बनाने वाली और बर्तन धोने वाली मेड को भी हटा दिया। अब शीला एक मिनट को भी फ्री न होती। बच्चों को स्कूल से लाना और उनका होमवर्क से लेकर घर के सारे काम शीला करती थी पहले भी पर अब रोटी बर्तन भी सब करने लगी। शीला अंदर से बहुत टूट गयी थी। उसे बहुत बड़ा झटका लगा था। कंपनी ने उसे तुरंत निकाल दिया बिना किसी पूर्व चेतावनी के। वो पूरी तरह से टूटा हुआ महसूस करती थी। जब ऑफिस जाती थी तो सबका नाश्ता, ड्रेस प्रेस करना, दूध बनाना , टिफ़िन तैयार करना , बैग पैक करना बच्चों को तैयार करना चकरघिन्नी की तरह शीला करती रहती थी और ऐसे में लेट हो जाती थी। ऑफिस पहुंचने के बाद उसमें हिम्मत नहीं बचती थी की वो बात भी कर सके। उसको बच्चे भी लेने होते थे। तो ऑफिस से जल्दी चली जाती थी क्यूंकि डे केयर उसके ऑफिस के समय पे ही बंद होता था। पर बात न करने की वजह से सारा फोकस अपने काम पे लगाती थी और हर दिन का काम समय से पहल कर के दे देती थी। इसलिए कंपनी को केवल उसका टाइम का बहाना दिखा।


राकेश अगर कोई काम करता भी था तो एहसान दिखा के। ऑफिस से आते ही फ़ोन पे घंटो बात करते रहना अगर किसी दिन जल्दी आया तो और जब खाना बन जाता तो टेबल पर आ जाता था। दोनों एक दुसरे के लिए अजनबी बन गए थे। शीला ने बात करना बंद कर दिया। उसका किसी से बात करने का मन नहीं करता था। और जिन्हे वह फ्रेंड मानती थी वह भी बस नाम के ही थे। कोई उसे फ़ोन नहीं करता था। शीला चुपचाप अंदर ही अंदर दुखी रहने लगी। राकेश भी उससे बात नहीं करता था। अपने काम में व्यस्त रहता था। वो खुद से ही बातें करने लगी। उसने अपनेआप को ही दोस्त बना लिया। काम करती और बस अपना थोड़ा सा टाइम मिलता तो सो जाती या फिर किताबें पढ़ लेती। सोचती थी "चाहे लड़की कितना भी पढ़ ले, कितना भी उचाईयों पे चढ़ ले, आखिरी काम उसका घर का ही रहता है। क्या घर और बच्चे सिर्फ मेरे हैं । क्या हम दोनों की ज़िम्मेदारी नहीं है। क्यों कोई नहीं समझता। लड़कियों को आगे बढ़ना भी हो तो वो एक पोजीशन पे आके रुक जाती है। पर क्या पत्नी कभी और ऊपर नहीं उठ सकती।" खुद से ही बातें करती।


अब तक शीला दोबारा जॉब न करने का मन बना चुकी थी। एक दिन शीला ऐसे ही सुस्ताने बैठी तभी उसे लगा जैसे कोई कह रहा हो 'देखो शीला, तू ऐसे तो हिम्मत हार नहीं सकती , अब जॉब तो बहुत साल कर ली तूने और आगे भी जब जॉब करेगी तो यही हाल रहेगा। तो जॉब छोड़ो और कुछ और करो। जो तुम्हे अच्छा लगता है अब वो करो। अब अपने बच्चों की और घर की देखभाल के साथ अपनी भी उन्नती करो। लेकिन कैसे? उसने इधर उधर देखा कोई नहीं था। यह कोई और नहीं उसका अपना मन बोल रहा था। अचानक शीला के अंदर जोश भर गया। उसने सोचा जो थोड़ा खाली समय उसे मिलता है उसका सदुपयोग कर ले तो बात बन सकती है। पर करे क्या ? ऐसे ही जब एक दिन सारा काम कर के लेटने के बाद अचानक शीला का मन चित्र बनाने का और उसमें रंग भरने का करने लगा। उसने कहा टाइम पास में क्या बुरा है। फिर क्या था उसने कागज़ पर रंग भरने शुरू कर दिए और जो उसकी मन में चाहत थी वैसा ही तस्वीर बना दी। इस बीच उसका ध्यान कहीं नहीं भटका। ध्यान ऐसा लगा कि उसने कृष्णा का ऐसा सुन्दर चित्र बनाया रंग भर कर की वह खुद देखती रह गयी और इसके बाद इतना खुश हुई मानो उसे जाने क्या मिल गया था। वो अपना सारा दर्द भूल गयी।


अब यह रोज़ का काम था उसका अपने खाली समय में वह सुन्दर चित्र बनाती और छुपा के रख देती क्यूंकि राकेश को फालतू के काम लगते थे। उसे अच्छा नहीं लगता था। एक दिन शीला ने एक आर्ट वर्क कम्पटीशन देखी। अपने सजीव चित्रों को लाइए और इनाम भी जीतिए। शीला का मन किया क्यों न कोशिश की जाए। ऐसे भी कुछ नहीं से कुछ तो करुँगी। जीतना नहीं पता मुझे पर अपना पूरा ध्यान लगा के एक ऐसा चित्र बनाउंगी जिससे मेरे दिल को ख़ुशी मिले चाहे फिर जीतूं या न जीतूं। शीला ने वह चित्र बनाया जो उससे करना अच्छा लगता था। तस्वीर बनाना, लोगों की मदद करना, आज़ाद पंछियों को आसमान में उड़ते हुए देखना सब उसने तस्वीर में सजीवता से रंग भर कर बनाया और प्रतियोगिता के लिए भेज दी। अब शीला बहुत खुश रहने लगी और अपना ध्यान भी रखने लगी घर के साथ-साथ। .राकेश को समझ नहीं आ रहा था उसने शीला का ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा था। राकेश को पहले से ज़्यादा अच्छी लगने लगी शीला। राकेश उससे प्यार करता था और अब और ज़्यादा प्यार और इज़्ज़त करने लगा और उसके साथ घर के कामों में मदद करने लगा। उसके साथ समय व्यतीत करने लगा। एक दिन जब बच्चे स्कूल चले गए थे और राकेश भी ऑफिस जाने वाला था तब दरवाज़े पर घंटी बजी और एक लेटर दरवाज़े के नीचे से पोस्टमैन डाल गया। शीला ने लिफाफा उठाया और उसने खोल कर देखा तो उसकी आंखे अश्रु से भरी हुई मुँह खुला का खुला रह गया था। उसने वह प्रतियोगिता जीत ली थी और इनाम भी। उसका चित्र इतना सजीवता से बनाया हुआ था की आर्ट वर्क कंपनी ने उसे अपने यहाँ जॉब करने का ऑफर दे डाला और घर पर से ही अपने चित्र बना कर भेजने के लिए चुन लिया था। और इसके लिए उसकी तनख्वाह भी फिक्स कर दी थी। राकेश को जब पता चला तो उसे बहुत गर्व हो रहा था। उसने अपने किये की माफ़ी मांगी शीला से। आज शीला का सच में ज़िन्दगी जीने का मन करने लगा था। आखिर खुद को उसने ढ़ूढ़ लिया था। "जो मेरा पैशन वही मेरा प्रोफेशन.."


दोस्तों , ज़िन्दगी हम सबको एक मौका ज़रुर देती थी अपने आप से मिलवाने का। बस मौका ढूढ लेना चाहिए अपनी खूबियों को निखारने का तो अपनी उन्नंती करते रहो और समय का सदुपयोग करते रहो। आशा करती हूँ आपको मेरी यह कहानी पसंद आयी होगी।



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