वसुधैव कुटुंबकम्
वसुधैव कुटुंबकम्
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बचपन से सीखा था हमने मां धरती को करना नमन,
रोई भी थी बचपन में क्योंकि सपनों में धरती रोई थी,
मां ने मुझे उठाया, बहुत समझाया की बेटा तू सिर्फ सोयी थी,
मां सीता की भी धरती थी,जो उन्हें संभाला करती थी।
तुझसे हैं हम जुड़े हुए तू हमें है पाला करती,
हर घर हर मन में बसी तू ही है,नाम रंग और रूप कई हैं,
अन्न, धन सब तुझसे ही,मेरा वजूद तुझ में ही
चार दिन के जीवन में तुझ से ही मिल जाना है,
जाने क्यों रोता मानव है, यह रैन बसेरा सारा है।
