वो पर्याप्त है ख़ुद के लिए..!
वो पर्याप्त है ख़ुद के लिए..!
वो पर्याप्त है स्वयं में स्वयं के लिए
ख़ुद के भीतर संपूर्ण दुनिया है उसकी,
जिसके साथ वो उन्मुक्त हो हँसती है
स्वछंद हो थिरकती है आप ही आप के लिए,
अपनी ही धुन में मगन गुनगुनाती है,
छेड़ती मधुर तान, देती ताल पे ताल
ताकि ना हो ज़िंदगी बे-ताल और नीरस,
उसकी तान दूर तलक जाकर छिटकती हुई
टकराकर घूमती हुई ब्रह्मांड में गूंजती है
उसके साथ है उसकी ख़ुद की
एक खिली हुई सुगंधित जूही की दुनिया
अकेली नहीं है वो
जहाँ भी बैठती है महफ़िल सी
सज जाती है उसके इर्द गिर्द
वो पर्याप्त है ख़ुद के लिए।
