STORYMIRROR

Gairo

Others

4  

Gairo

Others

ऊँघ

ऊँघ

1 min
247

एक अजीब सा सपना था वह 

मगर याद नहीं ज़रा भी 

हां कुछ क़तरे हैं उसके

जो चिंगारियो की तरह उठते हैं 

इनकी चमक में कोई अलग ही जीवन दिखता है मुझे 

ऐसे दृश्य दिखते हैं जिन्हें मैंने कभी जिया ही नहीं 

फिर भी क्यों वह असल यादों जैसे लगते हैं? 


दिन का ही वक्त रहा होगा

मुश्किल से कोई एक डेड झपकी आई होगी

उन्हीं ऊंघने की हरकतों के दौरान

उस थोड़े से अंतराल में ही 

ये सब काम हुआ

शायद किसी और का अफ़साना

मेरे दिमाग में अंजाम हुआ।

 

सोचता हूं हर बार की तरह हीं

कि दोबारा आंखें मूंदकर अगर

नींद को ज़ेहन में छा जाने दूँ

पहले कभी मुमकिन हुआ जो नहीं

उसको मुकम्मल कराऊं अभी

पर ऐसा हो ना पाया कभी 

और इसी तरह 

उस नींद की फ़िराक़ में

बेचारे मेरे सपने भी सपने रह जाते हैं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Gairo

पहली

पहली

1 min पढ़ें

हलवा

हलवा

1 min पढ़ें

हाल

हाल

1 min पढ़ें

ऊँघ

ऊँघ

1 min पढ़ें

लत

लत

2 mins पढ़ें

दाना

दाना

1 min पढ़ें

डोर

डोर

1 min पढ़ें