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Ramandeep Kaur

Others

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Ramandeep Kaur

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तुम बिन

तुम बिन

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मैं जी नहीं पाऊंगी तुम बिन

हां जी नहीं पाऊंगी तुम बिन।


चाहे रिश्ते हजार मिल जाए,

पर साथ ना कोई भी तुम बिन,


चाहे नाम अनेकों पड़ जाऐं,

पहचान नहीं मेरी तुम बिन,


चाहे काम पहाड़ से बढ़ जाऐं,

पर शक्ति नहीं होती तुम बिन,


चाहे वक्त बहुत कम रह जाए,

पर मूल्य नहीं मेरा तुम बिन।।


यह तय है, मेरा अनुभव है,

मैं जी नहीं पाऊंगी तुम बिन...


तुम!

कौन हो तुम ?


तुम मेरी हस्ती का कारण हो,

तुम मेरा स्वाभिमान भी हो।


तुम मेरे अंदर दहक रही,

प्रकाश पुंज की ज्वाला हो।


मैं नारी हूँ और शक्ति भी,

तुम मेरे आत्म संबल हो..


तुम मेरा संयम कोष भी हो,

और ममता की नौ निधि धारा भी..


तभी....


चाहे कोई साथ ना रह पाए,

पर साथ मेरे तुम हो हर क्षण।


चाहे युद्ध अनेक हों जीवन में,

पर स्नेह तुम्हीं से है हर क्षण।


चाहे कोई पुकार न सुन पाए,

तुम सुनते रहते हो हर क्षण।


चाहे मन न कहीं भी बहल पाए,

दिल को समझाते तुम हर क्षण।


तो ये तय है, मैंने देखा है,

मैं जी नहीं पाऊंगी तुम बिन

मैं जी नहीं पाऊंगी तुम बिन...


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