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Sri Sri Mishra

Others

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Sri Sri Mishra

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तरंग

तरंग

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वो पाक़ नजर सा ठहरा

वो कुदरत का नज़ारा गहरा

फैली थी फ़िजा की खुमारियों की बांहों में

धरा की क्षितिज से झील की पनाहों में

हर पल पर भर रहा शोखियों से सतरंगी रंग

पहले प्यार की सुन रही प्रकृति झंकार की तरंग


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