सरिता
सरिता
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सरिता जब तुम
पर्वत का वक्षस्थल चीर
धरा पर अवतरित होती हो
वेगवती अल्हड़ नारी सी
तुम प्रतीत होती हो
सर्पिल मोडों पर टकरा कर
कलकल मृृृृदुल हास्य तुम सूनाती हो
अनेक लवणों से परिपूर्ण जल
स्वच्छ शीतल निर्मल हो
प्राणों को जीवन देता स्वरुप
आबाध गति से बहती तुम हो
कलकल छलछल करती तुम
अपने में समाती निर्माल्य हो
कहीं तीव्र कहीं मंथर गति से
मगर बहती तुम निरंतर हो
सब कुछ छोड़ सिंधु जलकण में
समा जाने को तत्पर लगती हो
सरिता जब तुम पर्वत का
वक्षःस्थल चीर धरा पर
अवतरित होती हो
वेगवती अल्हड़ नारी सी
तुम प्रतीत होती हो
