सोच
सोच
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बदल रहे हालात ऐसे,
हो चला नजारा है ऐसा
औपचारिकता ओढ़ चला,
परिवार अपना परायो जैसा।
कहने लगे सभी अब तो,
समय का अभाव है।
क्या करें? समय भी नहीं
वरना परिवार से बहुत लगाव है।
घड़ी में तो रोज वही बजते है
एक से लेकर बारह
घड़ियां बंटी वही सुबह दोपहर शाम में।
फिर यह समय कहां गया?
जाने किस मुकाम पे ।
बदल गई तस्वीर माना,
परिवर्तन जरूरी है,
पर क्या केवल इसी आड़ में,
सोच बदलना मजबूरी है।
स्वार्थ पड़ा सब पर भारी,
लगाव पर परिवार पर
समय बना बलि का बकरा,
और समाज दुर्दशा की कगार पर।
कभी घड़ी दो घड़ी सोच भी बदल कर देखो,
समय अपने आप बदल जाएगा,
परिवार से लगाव पुनः गहरा हो जाएगा।
