Shipra Verma
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श्वेत रुई से बादल छाए
कैसे-कैसे रूप बनाए।
कभी पक्षी तो कभी शेर बन
मन को मेरे रहे लुभाए।
कौन है वो बस एक चित्रकार
मेरे आसमान को है सजाए।
प्रेमी बदरा, प्रियतम बदली
वो जब देखे तो शर्माए।
उड़ गई 'शिप्रा' बादल के संग
जगवालों को नज़र न आए।
वको: ध्यानम्
रैन में बेचैन
इक छोटी सी कश...
दुपट्टे और पर...
अरबी अश्व
मैं वन मन की ...
ओ श्वेत वर्ण ...
कच्छप
तूफान
बचपन बचा रहे ...