शहर
शहर
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मैं शहर हूं
जागा हुआ रहता
रात भर हूं
चैन की नींद
कहां भाग्य में मेरे
व्यस्तता ही रहती
हमेशा साथ मेरे
चाहता हूं मैं भी
कभी हो सवेरा ऐसा
जब ना कोई
बेसबर हो
शांति भरी हो रातें
और सुनहरी सी
सहर हो
सड़कों पर ना हो
ये भागती गाड़ियाँ
अखबारों में भी
अमन की खबर हो
गाँवों की वो सरलता
कहां से मैं लाऊँ
वह मोहक हरियाली
खुद में कैसे सजाऊं
यहां तो समय की
रहती आपाधापी
सबको कहीं
पहुंचने की होती जल्दी
खेतों की हरीतिमा
नदियों की कल-कल
कहीं पीछे अपने
मैं छोड़ आया
अपनों का नेह,
सजीले चौखटों से
कब का हूँ मैं
मुंह मोड़ आया।
