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ca. Ratan Kumar Agarwala

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ca. Ratan Kumar Agarwala

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सावन

सावन

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कम गया रवि का उत्ताप,        

बही हवा सावन की ठंडी।

पेड़ों में भी हरियाली छाई,

फूलों की सेज बनी पगडंडी।

 

सुहाना यह मौसम सावन का,

बरसते बादल छम छमा छम।

बागों में पड़ गए झूले,

नाचते बच्चे धम धमा धम।       

 

आसमां में छाए चहूँ ओर,

धवल बादल जैसे कि कपास।

बारिश की बुंदे गिरे चहूँ ओर,

मोतियों सी छपास छपास।

 

बारिश ने चूमा ज्यों मुखड़ा,

शरमा उठी भीगी वसुंधरा।

महक उठी, ली अंगड़ाई,

पहना सफेदी का गजरा।

 

किसान बोता खेतों में बीज,

दिल में जगाता नए अरमान।

अगर कभी बारिश न हो तो,

होता रहता वह परेशान।

 

इस सावन की बेला में,

प्रेम रस में रंगी हर राधा।

आँखें तकती प्रेमी को हर पल,

बांटने को मन सब आधा आधा।

 

खेतों में खड़ी बाट जोह रही,

लेकर हाथों में जल की लोटी।

प्रिय आए मेहनत करके,

खिलाए अपने हाथों से रोटी।

 

सावन महीना होत प्रीत का,

गाए सभी गीत प्रेम का।

बागों में लगे मस्ती के झूले,

झूला झूलते प्रेमी प्रेमिका।

 

भीग गई धरती इस सावन,

भीगे सारे खेत खलिहान।

खिलेगी आंगन में आश की लौ,

जब आएगा घरों में धान।

 

हे सावन तू फिर आना,

मन में प्रेम सभी के लाना।

नफरत को तुम दूर भगाना,

हर आंगन में खुशियां जगाना।

 



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