ऋतुराज का नव विहान
ऋतुराज का नव विहान
1 min
248
शरद ऋतु का हो गया अवसान
ऋतुराज का हुआ नव विहान
देखो खेतों में सरसों लहराई
पीली चुनर ओढ़े धरा बलखाई
वृक्ष पर पंक्षी करते बसंत गान
ऋतुराज का हुआ नव विहान
सूरज की किरणें प्रखर है
ओलाव अब तो अंतिम है
गाँव घर में छाई ख़ुशियाँ
देखो आम्र में गुंजित है
पवन चले अब गीत सुनाती
मधुरिम होकर बहती जाती
मेरे तन से उठे अब लग्न है
कवि गढ़ता रोज गान
ऋतुराज का हुआ नव विहान
