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राज़ राज़ ही रह जाये तो अच्छा

राज़ राज़ ही रह जाये तो अच्छा

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कुछ राज़ राज़ ही रह जाते तो अच्छा होता

वो हम पर मेहरबानियां लुटाते रहे

और हम उनको कसूर-वर ठहराते रहे

दोष किसका था नहीं जानते हम

कभी उनको तो कभी खुद को गुनहगार ठहराते रहे

कोशिश तो की हमने हर फासला मिटने की

पर तकदीर को शायद कुछ और ही मंजूर था

ना मिलते हम तो अच्छा होता न दर्द उनको और

ना ही हमको मिले होते

राज़ राज़ ही रह जाये तो अच्छा


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