रामलला
रामलला
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का देखन जाऊं मैं ऊ नगरी
जहाँ रामलला की मूरत नाहीं।
कर वायदे कितने निकल लिये
बरस दिन जाने कितने बीत गये।
जाने रहते होंगे रामलला कैसे
घर पडा है उनका खंडर के जैसे।
मंदिर देखन को नैना तरस गये
सावन के जैसे यह बरस गये।
अयोध्या है अब भी उजडी - उजडी
का देखन जाऊं मै ऊ नगरी।
पुरुषोतम राम अब बिलखना रहे
एक छत पाने को तो तरस रहे।
विनती करते सब तुम्हारे द्वार
अब बनबा दो मंदिर का द्वार।
