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Rashi Singh

Others

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Rashi Singh

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अश्क

अश्क

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​तुम्हारी आँखों से गंगा यमुना बहती है

​अक्सर लोगों की शिकायत रहती है

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​रोने लगती हो तिल भर सी भी बात पर 

​क्या इससे तुम को कोई खुशी मिलती है

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​आँखों से नहीं यह जल दिल से आता है 

​नैन तो बस दरिया का ज़रिया बन जाता है

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​कभी खुशी से छलकती है तो कभी ग़म में 

​नमी नम कर ही देती है इनको हर मौसम में

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​क्यों दर्शाती हो रोकर अपनी कमज़ोरी को 

​ढक लो तुम इनको मुस्कानों की खोली से

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