अश्क
अश्क
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तुम्हारी आँखों से गंगा यमुना बहती है
अक्सर लोगों की शिकायत रहती है
रोने लगती हो तिल भर सी भी बात पर
क्या इससे तुम को कोई खुशी मिलती है
आँखों से नहीं यह जल दिल से आता है
नैन तो बस दरिया का ज़रिया बन जाता है
कभी खुशी से छलकती है तो कभी ग़म में
नमी नम कर ही देती है इनको हर मौसम में
क्यों दर्शाती हो रोकर अपनी कमज़ोरी को
ढक लो तुम इनको मुस्कानों की खोली से
