नज़रबंद कलम
नज़रबंद कलम
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लिखना एक कला हैं हम सब जानते,
पर पता हैं लिखने पर भी होती बंदिशे
स्वतंत्र लेखन के भी बदल गये मायने,
कलम ग़ुलाम हैं हुक्मरानो के साये में,
सच्चाई छिपती नहीं पर पैसों से दबा देते,
यूँ समझिये की कलम की नोक तोड़ देते।
जकड़ी हुई स्वतंत्रता के नाम पर बेड़ियों में,
सत्ताधीन जिसकी चाबियाँ लेकर घूमते।
बलात्कार, चोरियाँ बड़े अक्षरों में प्रथम पृष्ठ पर छापते,
जनता के हित की बातें बारीक़ शब्दों में दिखाते।
बिना ग़र्त में जाये अर्थ का अनर्थ करके हमें परोसते,
कलम बिकी कागज़ बिका और हम ठगे से देखते रहे।
