नृत्यांगना मालती
नृत्यांगना मालती
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एक लड़की थी अनाथ
कोई ना था उसके साथ।
नाच गा कर पेट पालती
नाम था उसका मालती।
अकेली भटका करती थी
रो रो कर मटका भरती थी।
कोई साथी ना कोई अपना
पूरा ना हुआ कोई सपना।
सुन्दरता से परिपूर्ण रचना वो
यौवन भरी चमकीली रत्ना वो
भटक कर पहुँची राज दरबार
सैनिक ले गये महल के द्वार।
मिल गया उसको अच्छा काम
करने लगी जगत में नाम।
मन लगा कर करती काज
राज नर्तकी बन गई आज।
राज गायक हुआ उस पर फिदा
शादी कर ले कर हुआ विदा।
