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नीम-नीम, शहद-शहद

नीम-नीम, शहद-शहद

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​स्त्री नीम-नीम और शहद-शहद सी होती है

​कभी डर जाती है मकड़ी से,

​सताए कभी बच्चों को यह तो इससे लड़ जाती है।

​कभी डर जाती है तेज ध्वनि से भी

​जब घुटन हो जाए असहनीय तो

​चीत्कार से उसके सारी धरती थर्राती है।

​स्त्री आकाश में उड़ती पतंग सी होती है

​आज़ादी में अच्छी दूरी तय करती

​खींची जाए जबरन तो फटकार उड़ जाती है।

​कभी रो पड़ती है तिनका चुभने भर से

​जब प्रसव पीड़ा हो तो

​असहनीय पीड़ा सह फांसी पर चढ़ जाती है।

​स्त्री फूलों सी सुकोमल और मासूम होती है

​रो पड़ती है काँटा चुभने पर

​जिंदगी काँटों को हँस-हँस कर सहती है।

​खल-खल बहती हर पल नदिया सी

​स्थिर नहीं रहती है

​सब सुनकर भी खामोशी का बुत बन जाती।


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