नदी की आत्मकथा
नदी की आत्मकथा
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पहाड पर बरसाती हूं।
गर्व से झर-झर जोर से
झरना बनकर गिरती हूं।
गाँव या शहर बिना भेदभाव
समतल पर बहती हूं।
सभी जीवजंतुओं से मिलती हूं।
सच में गंदे,कचडा डालते हैं मुझ पर
सहनकर फिर से चलती हूँ शांति से।
पहाड,वन और सारे राहोंसे
ले आती हूँ ढेर सारी धातु भर मिट्टी।
धीरेधीरे अंत में विदा लेती हूं
सागर में डूबती हूं सारे संपत्ति।
नदी और नारी दोनों की
समता पहचानो,पवित्रता बचाओ।
