मेरी कविता
मेरी कविता
मेरी कविता मेरे अकेलेपन की साथी है
मैं एक दिया हूँ
मुझे प्रकाशित करने वाली, वो बाती है
मुझ में तन्हाई के सागर गहरे
लाखों की भीड़ में जो सखा कहलाये
ऐसे साथी न मेरे
मेरी कविता सागर की लहरें बन मुझे नचाती है
मेरी कविता, मेरे अकेलेपन की साथी है
ये जिंदगी मन झुलसा देने वाली एक धूप है
कभी- कभी रात की सुंदरता व शीतलता है
तो कभी दिन की घनघोर घटा इसके रूप हैं
मेरी कविता इस जिंदगी में
दिन की गुनगुनी धूप बनती
तो कभी रात का तारा तोड़ गिराती है
मेरी कविता मेरे अकेलेपन की साथी है
बिना किसी आलोचना के चुपचाप
सुन लेती मेरी आपबीती
पर बिन जुबान के भी
ये बन जाती सुलझी एक रीति
खत्म होती सी जिंदगी में ये
ये नई सांसे उगाती है
मेरी कविता मेरे अकेलेपन की साथी है।
