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पुनीत श्रीवास्तव

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पुनीत श्रीवास्तव

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मेहमान !

मेहमान !

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कैसे कोई सोये सोये जम्हाई ले लेता है

सोये में हँस रो पड़ता है ,

जब सोये सारा मोहल्ला घोड़ा बेच के

फुल ऑन चिल्ला के रो लेता है ,

भोर में जगा के सबको खुद बिना ग्लानि भाव के निश्चिन्त सो सकता है

कोई है जो ये सब डंके की चोट पे करता है

मुस्कुराइए आप के घर एक नन्हां मेहमान आया है !



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