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Renu Sahu

Others

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Renu Sahu

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मैं तो एक पराई थी?!

मैं तो एक पराई थी?!

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कल किलकारी बन के तेरे

आँगन को जीवंत रखी

छोटे पैरों मे पहन के पायल

कानों को मधुर मैं लगी

तेरे घर के उस कोने में, मैंने

अपना घरौंदा बसाया था

वही गुड्डा गुड़िया की शादी में

जमकर ढोल बजाया था

रसोई में चूहे के बिल में

दूध के दाँत छिपाई थी

हाथ बढ़ाया माँ तुने तो

सरपट दौड़ी आई थी


जो खेली पासा, दादी संग

वही कहीं रखा होगा

पिताजी की पुस्तक नगरी में माँ

मेरी कहानियों का एक घर होगा

गिरी वहीं सम्भली भी वहीं

अच्छे बुरे की सीख जहाँ पाई थी

फिर क्यूँ दादी कहती थी माँ कि

मैं तो एक पराई थी?


मेरे जन्म दिवस में माँ

भर कटोरी खीर बनी

पिताजी ने भी अपनी मेहनत से

मेरे लिए सीढ़ियां रची

देखा वहीं मुस्कान तेरा

और रोना भी कहीं कोनों में

सपने हमारे पूरे करने को

आपके सपने रह गए बस अधरों में

पिताजी हमारे लिए जिए, तो तुने

भी तो नींद गँवाई थी

फिर क्यु दादी कहती थी माँ कि

मैं तो एक पराई थी?


याद है ना गर्मी की छुट्टी

बच्चों का आतंक छा जाता था

सुबह से शाम बस खाना पीना

और खेल-कूद सुहाता था

बुआ चाचा की डॉट से सहमे

मामा नानी का प्यार मिला

बचपन से यौवन तक सारे

भाई बहनों का साथ रहा

एक भरी पूरी टोली थी वो तो

मिल के कितनी ही होली मनाई थी

फिर क्यूँ दादी कहती थी माँ कि

मैं तो एक पराई थी?


दुनिया जैसी भी पर हम है अलग

वो अनुशासन संस्कार दिया

भीड़ से अलग खड़ा होने का

साहस और सम्मान दिया

जब जब गिरे हम साथ आप ही

हर मोड़ पे हिम्मत बढ़ाई थी

फिर क्यूँ दादी कहती थी माँ कि,

मैं तो एक पराई थी?


आया पल जब शादी का

दीदी को हमने सजाया था

भैया के पीछे भाभी को

नए घर से मिलवाया था

नए सफर को सज्ज जोड़ों संग

आलिंगन था दो परिवारों का

असमंजस नए रिश्ते नातों की

बिछुड़न कलि से बागानों का

पल में घर बदला, परिवार भी बदले

लेकिन ये रस्म तो बस 'विदाई' थी

क्या इसीलिए दादी कहती थी माँ

कि, मैं तो एक पराई थी?


रस्मे निभाते नए रिश्ते बनाते

पुरानी नहीं छोड़ी जाती

थोड़ी दूरी लेकिन वहीं अपनापन

जब लाडली विदा होकर जाती

शादी मात्र अध्याय है

इस जीवन रूपी कहानी की,

इसलिए मना करना माँ,

दादी को कहने से

कि मैं तो एक पराई थी!


देखो, मुझे भी जाना है दीदी की तरह

जैसे आप और मेरी दादी,

अपने इस घर में आई थी

समझ गई माँ की दादी क्यूँ कहती

मैं तो एक पराई थी!

ढूँढ़ लाए एक फुलकुवर, 

जिनको था मेरा सहचर होना |

माँ पिता सा खोज दिए, 

सास ससुर का घर कोना |

सर से पाँव सोलह श्रृंगार, 

आँचल में बांधा संस्कार |

सर पर चूम विदा किये, 

देकर आशीष अपार  |

कुछ ही घंटो में बड़ी हो गई, 

वो अल्हड़ तेरी नाजुक सी कलि |

समेटने गृहस्थी अपनी, 

और बिसराने बचपन की गली |

"बचपन का घर" है मेरा? 

या "ये" जो मेरी गृहस्थी है ?

तेरे दर्द को भी न अपनापन दे पाऊ, 

बात क्यों इतनी उलझी है?

भाव तो और भी गहरे हुए, 

पर शायद छुट गया सारा अधिकार,

किन पर हक़ जत्लाकर कह दू ? 

दिखलाऊ नाज नख़रे हज़ार ?

अब कर्तव्य वहन करने पे दादी, 

तेरी बाते समझ में आती है |

जान गई हूँ अर्थ तेरा तू, 

क्यों कहती थी मुझे पराई है |

क्यों कहती थी मुझे पराई है |



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