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Alka Agarwal

Others

4.0  

Alka Agarwal

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मैं एक नारी हूँ

मैं एक नारी हूँ

1 min
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मैं तो चाहती थी....

तुम्हें एकाधिकार देना..

पर तुम्हें.....

और, और, और की भूख व्याप्ती रही....


और...फिर मैं भी सिमटती गई खुद में, 

और तुम्हें.... 

रोज....थोड़ा-थोड़ा त्यागती रही...


न मैं ही दबी एहसानों तले, 

न तुम ही दबे एहसासों तले, 

तुम हो गए खुद में मसरूफ

और मैं खुद के वजूद को

तलाशती रही....


और....फिर मैं भी सिमटती गई खुद में, 

और तुम्हें....

रोज.....थोड़ा- थोड़ा त्यागती रही


न तुम ही शहजादे हुए, 

न मैं ही राजकुमारी हुई, 

तुम खोए रहे ख्यालों में अपने

और मैं अपने ख्यालों को

हकीक़त में उतारती रही


और....फिर मैं भी सिमटती गई खुद में, 

और तुम्हें...

रोज....थोड़ा- थोड़ा त्यागती रही..


न शून्य हुआ भाव मेरा, 

न तुम्हें ही खला अभाव मेरा, 

तुम चलते रहे औरों के प्रभाव में

और मैं स्व-भाव को निज में

तराशती रही.....


और....फिर मैं भी सिमटती गई खुद में, 

और तुम्हें.

रोज....थोड़ा- थोड़ा त्यागती रही..



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