माँ के बराबर कोई नहीं
माँ के बराबर कोई नहीं
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मैंने संसार में जन्म लेते ही बहुत रिश्तों को था पाया।
मगर मेरी माँ के बराबर कोई नहीं, यह समझ आया।
माँ ने अपना दूध पिलाकर मेरे शरीर में लहू था बनाया।
ख़ुद भूखी रहकर मुझे भरपेट स्वादिष्ट खाना खिलाया।
कभी अपने मुंह का निवाला मुझे खुशी से खिला दिया।
पेट भरा होने का दिखावा करके केवल पानी पी लिया।
ख़ुद पुरानी सूती साड़ी पहनकर, उम्र गुज़ार दी अपनी।
मेरे लिए नए नए कपड़े सीकर आँखें ख़राब की अपनी।
माँ के प्यार और उपकारों का क़र्ज़ चुका सकता नहीं।
संसार में ढूँढने जाऊंगा तो, माँ जैसी ढूँढ सकता नहीं।
