लॉकडाउन
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वायु पुनः सरसराया है अपनी स्निग्धता की ओर
नदी ने पुनः पहना है यौवन का आवरण
वन्य पशु मिलने आए हैं जड़ हो चुके अपने
पुराने निकेतन से
श्रमिक को पुनः बुलाया है गाँव की गोदी ने
रोजगारों से उकताए लोग पुनः करने लगे हैं
पंक्तिबद्ध होकर कुटुम्बकीय भोजन
कोविड काल में प्रतिपादित हुआ है मेल-मिलाप का
नया कानून जन्म-मरण के रिवाजों का ढांचा सीख रहा है
नया ककहरा फूस का हो या हो गगनचुम्बी अट्टालिका
प्राण-रक्षा का सबसे अनिवार्य अपरिहार्य सुरक्षा चक्र है-
घर इतिहास को परिधान बदलते देख रहे हैं
हमारी सदी के लोग
