कविता दिवस
कविता दिवस
भावों को जो कागजों पर उकेरा
तो वह कविता में ढल गए।
वह जो आंखों से बह ना सके,
वही आंसू शब्द बन कागजों पर बिखर गए।
ह्रदय को तो अंतर से रीता कर गए
जब सारे भाव आकर कविता में सिमट गए।
वह कविता कुछ जानी पहचानी कुछ अनजान सी लगी।
अपनी कविता देखकर मैं खुद हैरान सी लगी।
जाने इतने भाव कहां पर समाए थे?
कवि तो मैं नहीं थी लेकिन यह सब कैसे लिख पाए थे?
शायद ऐसे ही किसी कवि का जन्म हुआ होगा।
जब उसने अपने मन के अनछुए पन्नों को
किसी दिन जो पढ़ा होगा।
भावों के कविता रूप में ढल जाने के बाद,
अनजाने की किसी का कवि बनने का प्रयास सफल हुआ होगा।
