कुर्सी
कुर्सी
ये कुर्सी के लिए होती जो मारामारी,
निरीह जनता बनती है सदा बेचारी,
बेईमानी का बढ़ रहा बोलबाला जो
ईमानदारी की दिख रही लाचारी।
कुर्सी के लिए सारे ईमान बिक रहे,
छल द्वेष में डूबे सब ही दिख रहे,
वादा खिलाफी तो आम बात बनी,
धोखा फरेब में लिप्त होना सीख रहे।
दुर्बल को सब सदा ही सताते हैं,
सबल के तलवे चाटते पाये जाते हैं
चमचागिरी अपने चरम पर है दिखती,
कुर्सी हेतु सब कुकर्म करते जाते हैं।
कुर्सी के लिए सगे संबंधी छूटते,
कुर्सी के लिए करीबी रिश्ते टूटते,
नाना प्रकार के देते प्रलोभन,
कुर्सी के लिए आक्रोश ही फूटते।
ये कुर्सी लगती है मुझको बेचारी,
जिसके लिए तुच्छ होती ईमानदारी,
धिक्कार है ऐसी कुर्सी पाने की,
जिसके लिए इंसानियत मिटती सारी।
