कोट ही बनते गहने ! (कोई भी मौसम)
कोट ही बनते गहने ! (कोई भी मौसम)
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जाड़ा
कांप कांप जाते दिन रात,
दहलाती ठंढक की रात।।
ठिठुरन की चलती जब बात,
कपड़ों की मिलती सौगात।।
तह पर तह बैठाकर हम सब,
गरम गरम कपड़े हैं पहने।।
सब कुछ रहता एक तरफ़ तब,
स्वेटर- कोट ही बनते गहने।।
