किताबों की तरह हूँ मैं
किताबों की तरह हूँ मैं
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किताबों की ही तरह हूँ मैं भी,
अल्फ़ाज़ तो बहुत हैं, मगर ख़ामोश हूँ।
ना रंग बदलती हूँ, ना लिखावटें,
एक राग लिये, मगर नीरस हूँ।
उलझनों के पन्ने अनगिनत से हैं,
एक आस लिए, मगर हताश हूँ।
ख़ुशियाँ आ जा रहीं है,
एक अंदाज़ लिए, मगर उदास हूँ।
किस्से भी बहुत हैं, किरदार भी बहुत हैं,
एक उम्मीद लिए, मगर तरस रही हूँ।
दिन गुजरते जा रहे हैं, पन्ने पलटते पलटते,
एक अंत लिए, मगर अधूरी सी हूँ।
