किरण
किरण
मेरे निराश इस जीवन में,
दीप्तीमान कुछ किरणें आईं ।
मेरे मन के हर कोने में,
आशाओं के कुछ दिप जलाईं ।
ऐ किरण ! तुम कहाँ से आई ?
खुशियाँ इतनी तुम कहाँ से पाई ?
क्या तुम ईश्वर की हो माया ?
तभी तुम्हारी इतनी सुन्दर काया,
क्या तुमने कभी ईश्वर को देखा?
उनकी अद्भूत शक्ति को परखा?
किरण मुझे देख मुस्काई,
बोली वह थोड़ी सकुचाई ।
ईश्वर तुम्हारे मन में बसते हैं,
हर पल तुम्हारे संग चलते हैं ।
माया उनकी तुम समझ न पाई,
यह तो है उनकी प्रभुताई ।
बढ़ती रहो यूँ ही जीवन में
पाओगी उनको हर क्षण में ।
सुख दुःख सब उनकी है माया,
इस भ्रम को कोई समझ न पाया ।
ऐ किरण, क्या तुम फिर जाओगी ?
फिर से ईश्वर को पाओगी,
उनसे बस इतना तुम कहना,
मेरे इस निशिमय जीवन को,
कांतिमय हर पल बनाएँ ।
अपने उन स्वच्छ सुन्दर हाथों को,
मेरे सर से कभी न हटाएँ ।
