कौन उफक के पार.....
कौन उफक के पार.....
1 min
433
कौन उफक के पार
मुझे बेसाख्ता बुलाता है
किसका ये इशारा
मेरी बेताबियां बढ़ाता है
खो जाऊँ आसमां की
निस्सीम बाँहों में
कौन है जो मेरे दिल में
यह हौसला जगाता है !
दिल है बच्चा, जब भी
दुनिया की भीड़ से घबराता है
दौड़कर निसर्ग के
सीने से लिपट जाता है
इक बादल मेरी हस्ती पर
चुपके से बरस जाता है !
कभी भीगी-सी साँझ में
चंदा गगन पर इतराता है
उसका ये अंदाज मुझे
बेसाख्ता लुभाता है !
कभी नवोदित दिवाकर
अरुण रश्मि से रिझाता है
सुर्ख गुलाब विहँस
मेरा वजूद महकाता है !
मुझे तो कुदरत में ही
अपना आराध्य नजर आता है !
