STORYMIRROR

निखिल कुमार अंजान

Others

3  

निखिल कुमार अंजान

Others

जमाने की आग बुझाते बुझाते.....

जमाने की आग बुझाते बुझाते.....

1 min
144

जमाने की आग बुझाते बुझाते

कब खुद के हाथ जल गए

निकले थे घर से कमाने को

लेकिन रस्ते से फिसल गए

हर मोड़ पर खड़ा है परेशां इंसा

देख उनके दर्द को पिघल गए और

अपने घर का दिया जलाना भूल गए

बेहिसाब दौड़ता रहा इन रस्तों पर

जाने कितने दिन कितने साल निकल गए

सिला क्या मिला मुझे भला इसका

उल्टा खुद के ही सवालों मे उलझ गए

कहते थे मुंजिद मुझको अपना

अब वो हर शख्स नजर चुराता है 

दूर से ही मुँह फेर निकल जाता है

खैर उसकी परवाह मुझको ना है

अपने घर लौटने को जी चाहता है

देख अपने मकां को तकता रह गया

इतनी आग बुझाई दूजे के झोपड़े की

कब अपना राख मे तब्दील हुआ और 

मे धुँए खड़ा अपने हाथ मलता रह गया.......


Rate this content
Log in