गुफ्तगूँ
गुफ्तगूँ
नव वर्ष की पूर्व संध्या पर
सामने लटके कैलेंडर को देख
मन में बात आई
क्यों न उसी से बात की जाए।
मैने कहा-कलैंडर
कल तुम बदल जाओगे
दिन वही रहेंगे तारीख को
बदला पाओगे
आज का 2018 कल 2019
हो जाएगा
विदाई और स्वागत का जश्ने
जुनून होगा
हर इंसा आलमें खुशी में
मशगूल होगा
कैलेंडरबदलने की दावतों का
सुरूर होगा
क्या खोया या क्या पाया,
चर्चाएँ होंगी
कुछ नए संकल्पों की
तामीर होगी।
बोला कैलेंडर-बहना, क्यों
मज़ाक करती हो
अब हमारी वह शान कहाँ?
एक समय था जब हम हर घर
की दीवार पर रहते थे
हर जेब, हर पर्स में रहते थे
पर .....
पर आज हालत यह है
वाल खराब हो जाएगी
दरवाज़े के पीछे लगाया जाता है
और वह भी किचन की....
थोड़ा रूक कर वह फिर बोला-
आज का इंसान बड़ा स्वार्थी है
मैने कहा-ऐसा क्यों कह रहे हो?
वह बोला
अगले पूरे हफ्ते
अरे यह पिछले हफ्ते से हो रहा है
मुझे शान से बाँटा जा रहा है
घर लाया जा रहा है
इसलिए नहीं कि मेरी जरूरत है
बल्कि अपनी झूठी शान दिखानी है।
थोड़ी चुप्पी के बाद वह फिर बोला
अब तो हम केवल एक दिन के
मेहमान हैं
जब मुझे देख छुट्टियाँ गिनी जाती हैं
पूरे साल के संकल्पों को धराशायी
किया जाता है
क्या करना है ?
कैसे करना है?
वगैरह ,वगैरह
दिन मौसम तय हो जाते हैं
थोड़ी देर के लिए सन्नाटा
वह फिर बोला
धन्यवादी हूँ मैं सरकार का ,
बैंकों का ,अन्य आँफिस का
आज भी मुझे हर कमरे की दीवार
पर लगाया जाता है
लालरंग में छुट्टियाँ दर्शा देश को
तरक्की की ओर ले जाया जाता है
मैने कहा-तुम खुश नहीं हो
वह बोला -नहीं नहीं ,यह बात नहीं
मैं खुश हूँ
आज भी मेरी जरूरत है
घर में दूध के हिसाब के लिए
सरकारी कर्मचारी को छुट्टी के लिए
बच्चों को इतवार के लिए
और
सब को व्रत, त्योहार, तिथि, नक्षत्र के लिए
मेरा पंचाग रूप
मैं बहुत खुश हूँ
नव वर्ष अभिनंदन में मेरा बड़ा हाथ है
मेरा बड़ा हाथ है
