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Sunita Arora

Others

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Sunita Arora

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ग़ज़ल - रोटियाँ

ग़ज़ल - रोटियाँ

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हाथ अपने सुलगा कर माँ है बनाती रोटियाँ, 

बस ये भूखा जाने कितनी हैं महँगी रोटियाँ। 


फेंक दी कह कर किसी ने हैं ये बासी रोटियाँ, 

खा लेता पकवान - सी कोई वो सूखी रोटियाँ। 


अध-जली बिन मेकअप की नार रोटी दीन की, 

घी में लिपटी, नान हो जातीं रईसी रोटियाँ। 


पत्नी पर झल्ला रहा था, दाग रोटी के दिखा, 

माशूका की जिसको लगती थी रुमानी रोटियाँ। 


जिस्म भूखा रख रहा कोई दिखावे के लिए, 

बेचता है जिस्म कोई, तब हैं मिलती रोटियाँ। 


सेंकता हर कोई मतलब का नमक डाले यहाँ, 

पस-ए-ग़ुर्बत बन रही हैं अब, सियासी रोटियाँ। 


कोख़ से माटी की जन्मा अन्न का दाना फ़क़त, 

"आरसी" हम ने बनाई, तेरी - मेरी रोटियाँ।  


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