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Sunita Arora

Others

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Sunita Arora

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स्वच्छंद रचना - संवाद

स्वच्छंद रचना - संवाद

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न जाने कितने संवाद किए थे मैंने खुद से, 

और कितने ही संवाद इन मूक दीवारों से 

जो टकराकर फिर लौट आए मुझ तक। 


कुछ शब्द कंठ के भीतर दम तोड़ गए 

वो बह चले थे आँखों से अविरल और

सहेज लिए गए थे नर्म कपोलों द्वारा। 


कुछ शब्द जो फूट पड़े थे कलम से 

वो छोड़कर गए थे एक स्याह छाप, 

काग़ज़ के श्वेताभ तन पर अमिट सी। 


कुछ शब्द जो मधु स्मृति में नहाए थे

सुरभित कर गए होंठो को ऐसे जैसे, 

मुस्कान की ओस पंकज की पंखुरी पर। 


कुछ शब्द आज भी अधूरे और अध्वनित हैं 

इस आस में कि कोई हो जो सुने उनको और 

हर शब्द को मिले पूर्णता प्रतिउत्तर के रूप में। 


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