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Sunita Arora

Others

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Sunita Arora

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ग़ज़ल - सतरंगी चूड़ियाँ

ग़ज़ल - सतरंगी चूड़ियाँ

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चूड़ियाँ सतरंगी, बादल पर सजाई किसने है, 

आसमां को होली बारिश में खिलाई किसने है। 


पूछता था दर ओ दीवारों से, जो मेरा पता, 

उस के ज़ेहन से मेरी गली, मिटाई किसने है। 


कौन लिखता कहकशां के ये सवाब-ओ-दर्द यूँ, 

टूटते तारों में खुशियाँ ये, छिपाई किसने है।


फूल ही माँगे होंगे उसने भी तो खुद के लिए, 

शूल पर ये ख़ाल-ओ-ख़द फिर चढ़ाई किसने है। 


था वजूद-ए-चश्म किसका इस जहां से पहले भी, 

मिस्ल कुदरत की हसीं इतनी, रचाई किसने है। 


बच गए माशूक झील-ए-चश्म की गहराई से, 

पलकों की चिलमन ये आँखों पर बनाई किसने है। 


सोचता भूखा वो बच्चा, देख कामिल चाँद को, 

माँ की ये रोटी आसमां पर यूँ, लगाई किसने है। 


ना सफ़र ना रास्ता उसका, न मंजिल कोई है, 

पस-ए-मिज्गाँ ख्वाब की दुनिया बसाई किसने है।  


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