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Sunita Arora

Others

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Sunita Arora

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ग़ज़ल

ग़ज़ल

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ख़यालों से अभी तेरा ख़याल गुजरा है। 

कि जैसे दश्त से कोई ग़ज़ाल गुजरा है। 


न हो सके वो मेरा तो ये बात काफी है, 

होकर नजर से मेरी वो ज़माल गुजरा है। 


कहा था उसने वहीं ठहरू मैं, मगर कब तक

कि बाद बरसों, ज़हन से सवाल गुजरा है। 


महक रही वो हरिक शय कि जिसको छू लूँ मैं, 

फक़त छू हाथ मेरे, वो रुमाल गुजरा है। 


बहक रहे हैं दरीचे ओ झूमते हैं गुल, 

सुख़न-ए-रिंद फ़िज़ा से कमाल गुजरा है। 


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