STORYMIRROR

कवि धरम सिंह मालवीय

Others

3  

कवि धरम सिंह मालवीय

Others

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min
217


इश्क़ भी मुख़्तसर ही रहा

हां वही दर्द सर ही रहा


मंजिलों का पता ही नहीं

किस्मतों में सफर ही रहा


मर्ज़ ए इश्क़ बढ़ता गया

हर असर बेअसर ही रहा


साथ में है परिंदे सभी

फूटता तो बशर ही रहा


है ख़बर इश्क़ की सबको ही

औऱ मैं बेखबर ही रहा।


Rate this content
Log in