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Surendra kumar singh

Others

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Surendra kumar singh

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द्विविधा

द्विविधा

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समझ विचारों के धुंध में है

औपनिवेशिकता की आगोश में

उसके गुणों से मुग्ध हम

आजादी का सपना देख रहे हैं

अभी ये जो चुनाव है

जिसमें हम अपने लिये

कुछ बेहतर चुन सकते हैं

इशारों से चलने वाली व्यवस्था को

कानून से चलने वाली व्यवस्था की आंख से देखकर,

सुनकर, कहकर

हम लोकतन्त्र की सार्थकता का

आगाज कर सकते हैं

अपनी आवाज व्यक्त कर सकते हैं

विश्वास कर सकते हैं

अपनी व्यवस्था में

अपने उपर

क्योंकि परिवर्तन का अभीष्ट ही है

हमारा होना, अपनी दिशा में चलना

अजीब सी द्विविधा है हमारी

यथार्थ के जड़त्व को शक्ति देते हुए हम

परिवर्तन का सपना देख रहे हैं।

कितना मुश्किल है

यथार्थ को देखना, उसमें विश्वास करना कि

व्यवस्था किसी के इशारे पर नाच नहीं रही है

नचा रही है

सत्ता को भी विपक्ष को भी।


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