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Dr. Poonam Verma

Others

4.7  

Dr. Poonam Verma

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दृष्टिकोण

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सुरमई सी सांझ में गगन ,

धरा से कर रहा था आलिंगन ।

अस्तगत सूरज शिथिल हो पुनः आने का वादा कर ,

अपनी किरणों को समेट चला था सुस्ताने ।

घोर अंधेरे में जीवन संभाले रात भर चलती रही धरा 

मंद मंद बहती रही पवन और प्यार 

बरसाता रहा गगन ।

टिमटिमाते तारों के बीच मुस्कुराता 

बारिक सा चांद तो अभी  तो आया था

फिर गया कहाँ?

टूटा था धरा का भ्रम,

व्यतिथ हो बोल पड़ी अम्बर से ;

चांद -सूरज और तारे सभी छुपते और  निकलते हैं। 

अनवरत चलने की नियति ,

नहीं  ये मुझसे ना अब होगा  ।

मुस्कुरा कर धीरे से बोला गगन  ,

तुम क्या जानो अपना मोल ?

तुम्हारी मिट्टी है बड़ी अनमोल,

सुई के नोक बराबर तुम्हारे अस्तित्व; के लिए मर मिटते हैं लोग ।

कभी मेरा दर्द समझो तो मै बोलूं,

मेरे हिस्से में हैं आते सुराख करने के लिए तबीयत से उछाले हुए पत्थर ।

तभी कांधे पर से अंधेरों का बोझ उतार,

 भोर आया नए उजालों के साथ;

 प्रातः बेला में प्रार्थना में उठे हाथों को देख झेंप उठा गगन । 

 एक नई समझ और सोच के साथ,

 अपनी -अपनी पीङा को भूल

 पुनः एक-दूसरे का कर आलिंगन

 चल पड़े उत्साह में भरकर

 बुला रहा था उन्हें उनका कर्म पथ ।


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