दो डगर मिल गये
दो डगर मिल गये
सादर नमन
दो डगर मिल गये, एक से हो गये।राहें जीवन में उनके गुल नये खिल गये।जिन्दगी ने स्वयं रंग उनमें भरा।सब दिये नेह के उनके दिल में जल गये।दो डगर मिल गये, एक से हो गये।
दिख रहे थे अलग पर अलग न थे वे।छोर उनके जुड़े थे कहीं न कहीं।जानते जो न थे छोर अपनी कहाँ।आज उनको किनारे स्वतः दिख गये।दो डगर मिल गये,एक से हो गये
मिल गये वे यहाँ जो थे भटके कभी।चाँद तारों ने भी कुछ दुआएं करी।इन दुआओं का ही कुछ असर है यहाँ।प्रेम के फूल जीवन में जो खिल गये।दो डगर मिल गये, एक से हो गये।
कोई काँटा न राहों में आये कभी।मैं करूँगा दुआयें तुम्हारे लिये।तुम सँजो कर दियों को रखना सदा।जो दिये जिन्दगी में तेरे जल गये।दो डगर मिल गये, एक से हो गये।
अमलेन्दु शुक्ल सिद्धार्थनगर उ०प्र०
