दीपक ये ज़रा दिल को......
दीपक ये ज़रा दिल को......
इन चाँद सितारों को उलझाए हुए रहना
आदत ये किसी की है बल खाए हुए रहना
आए के न आए वो ये छोड़ दिया उसपे
तुम राह मगर फूलों महकाए हुए रहना
क्या जाने के आईना कब सामने आ जाए
किरदार को तुम अपने चमकाए हुए रहना
कैसी ये मुहब्बत है जीने ही नहीं देती
जलवों में हमें उनके उलझाए हुए रहना
जब याद कभी आए तुमको भी दिवाने की
दामन को दुआओं में फैलाए हुए रहना
ख़ुशियाँ सी बरसती हैं आवाज़ सुनूँ इनकी
पायल को या कंगन को खनकाए हुए रहना
दिल प्यार मुहब्बत में तोड़े हैं ज़माने ने
‘दीपक’ ये ज़रा दिल को समझाए हुए रहना
