हर ज़माने के साथ में, मैं उड़ता हुआ आता हूँतूफान हूँ मैं, महज़ आँधी ना समझनाबहती हवा हूँ मैं, भिगी ज़ि... हर ज़माने के साथ में, मैं उड़ता हुआ आता हूँतूफान हूँ मैं, महज़ आँधी ना समझनाबहती ...
"भैया कैसी होगी वह स्त्री, पुत्र रत्न अपना खोकर, बस दिन अपने काट रहीं हूँ, बोझिल स्मृतियों से लड़कर, "भैया कैसी होगी वह स्त्री, पुत्र रत्न अपना खोकर, बस दिन अपने काट रहीं हूँ, बोझिल...
A poem about changing the centres A poem about changing the centres
लोगों से क्या, अब खुद से अंजान रह जाते हैं शीशे में भी हम, नज़र नहीं आते हैं|| लोगों से क्या, अब खुद से अंजान रह जाते हैं शीशे में भी हम, नज़र नहीं आते हैं||
कभी करीब से देखो मौत को परवानो कि तरह, तो उसके दामन में गिरे अश्क में भीग जाने को दिल हो ही जायेगा। कभी करीब से देखो मौत को परवानो कि तरह, तो उसके दामन में गिरे अश्क में भीग जाने ...
न है वो सोना, चांदी, हीरा, मोती वह तो है हमारी प्रकृति। न है वो सोना, चांदी, हीरा, मोती वह तो है हमारी प्रकृति।