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Shakuntla Agarwal

Others


5.0  

Shakuntla Agarwal

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चले जाते हैं कहाँ

चले जाते हैं कहाँ

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किसी शायर ने क्या ख़ूब लिखा हैं,

दुनिया से जाने वाले,

जाने चले जाते हैं कहाँ ?

कैसे ढूँढे कोई उनको,

नहीं कदमों के भी निशान !

जीवन का यथार्थ, 

ज़िन्दगी अर्ध सत्य, मौत सत्य !

सूक्ष्म आत्मा का निकलना,

हमारा मौत के आग़ोश में सोना,

न हँसना, न रोना,

चिर निद्रा में सोना !

ये हँस पखेरू,

न जाने कहाँ चला जाता हैं उड़कर ?

न समझ पाए ये फ़लसफ़ा !

अंतरिक्ष तक में सेंध लगा दी हमने,

पर समझ नहीं आया,

सूक्ष्म जीव कहाँ चला जाता हैं ?

कठपुतली की तरह नाचना,

किसी शक्ति का डोर खींचना,

हमारा यूँ चिर निद्रा में सोना,

क्षण - भंगूर हैं हम !

एक श्वास भी नहीं,

उसकी इज़ाज़त के बिना !

सक्षम हैं क्लोन बनाने में,

सक्षम हैं रोबोट बनाने में,

नहीं पार पाए हैं,

तो बस मौत पर !

ता उम्र मौत के खौंफ में,

जीते हैं हम !

दुल्हन सा सजा शरीर,

बन जाता हैं फ़िर ख़ाक !

दो गज़ कफ़न,

बस जाता हैं साथ !

पीछे छोड़ जाते हैं,

बस रोता - बिलख़ता परिवार !

उन सब से बेख़बर,

जाने चले जाते हैं कहाँ ?

जिनके बिन एक पल भी न रह पाते थे,

जिनकी एक चीख़ पर ही सहम जाते थे,

आज न चीख़ की परवाह, न रोने का भय !

सो जाते हैं फ़िर चिर निद्रा में,

फ़रिश्ते की तरह !

रिश्तों से परे, आत्मा रूपी जीव,

जाने चला जाता हैं कहाँ ?

फोटो छपती सिर्फ़ अख़बारों में,

ढूँढ़ते रहते हम उनको सितारों में !

काम आये देश के, वो ज़िन्दगी !

नाम कर जाए जहान में, वो ज़िन्दगी !

मौत को अमर बनाये, वो ज़िन्दगी !

फूल की तरह शहीदों के हार में

गूँथी जाए, वो ज़िन्दगी !

मर कर भी दूसरों के दिलों में

चिराग़ जलाये, वो ज़िन्दगी !

चाह हैं मेरी, शहीदों की तरह शहादत पाऊँ !

वतन पर जान लुटाऊँ !

बेमौत न मारा जाऊँ !

यूँ तो दुनिया में सब,

आते और जाते हैं "शकुन",

पर चंद ही हैं जो,

अमरत्व का घूंट पी पाते हैं !!


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