चाँद की मदहोशी
चाँद की मदहोशी
चाँद बड़ी मदहोशी में निकला,
बादलों में से छुपकर।
नैन के टीले से,
होठों पर लाली लगाए।
होठों पर मंद मुस्कान लिए,
कुछ कहने की फ़िराक में। 1
पवन तेज़ थी,
बादल न रुक पाए।
चाँद बहुत शर्मीला सा,
बार- बार बादलों में छुप जाए।
आँखों झुकी सी हैं,
कुछ धीमे से फुसफुसाए। 2
मंज़र ही ऐसा है,
कोई क्या कर पाए।
एक पहर ऐसा भी,
धीरे से बढ़ता आए।
वदन उसका ऐसा था,
सारी धरा चमकाए। 3
समय कहाँ रुकता है,
यह बस चलता जाए।
प्रकृति का शाश्वत नियम,
कभी न रुक पाए।
चाँद को दुःख भी रहा,
पर क्या कर पाए? 4
