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SARVESH KUMAR MARUT

Others

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SARVESH KUMAR MARUT

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चाँद की मदहोशी

चाँद की मदहोशी

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चाँद बड़ी मदहोशी में निकला, 

बादलों में से छुपकर। 

नैन के टीले से, 

होठों पर लाली लगाए। 

होठों पर मंद मुस्कान लिए, 

कुछ कहने की फ़िराक में। 1

                पवन तेज़ थी, 

                बादल न रुक पाए। 

               चाँद बहुत शर्मीला सा, 

               बार- बार बादलों में छुप जाए। 

               आँखों झुकी सी हैं,

               कुछ धीमे से फुसफुसाए। 2

मंज़र ही ऐसा है, 

कोई क्या कर पाए। 

एक पहर ऐसा भी, 

धीरे से बढ़ता आए।

वदन उसका ऐसा था, 

सारी धरा चमकाए। 3

               समय कहाँ रुकता है, 

               यह बस चलता जाए। 

              प्रकृति का शाश्वत नियम, 

              कभी न रुक पाए।

              चाँद को दुःख भी रहा, 

              पर क्या कर पाए? 4



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