चाहत
चाहत
वो पहरेदारी के दौर में
आज़ादी चाहती थी
सब बंदिशें तोड़
वो बेबाकी चाहती थी
वो बिना किसी रोक टोक के
खुलकर हँसना चाहती थी
बिना छुपे किसी से
वो जी भर रोना चाहती थी
बिना किसी के डर के
वो दिल की बात रखना चाहती थी
एक बड़े से आँगन में
अपना एक कोना चाहती थी
उसकी आँखों में बहुत से ख्वाब थे
जिन्हें वो साकार करना चाहती थी
दिल में उसके, बहुत ख्वाहिशें कैद थीं
जिन्हें वो आज़ाद करना चाहती थी
वो अपने आँसूओं को
ताकत बनाना चाहती थी
अपने शोंक को
अपनी आदत बनाना चाहती थी
ज़िम्मेदारी के माहौल में
खुल कर जीना चाहती थी
ज़्यादा नहीं, बस थोड़ी सी
थोड़ी सी तारीफ चाहती थी
वो रोज़ मिलती डाँट को
अनसुना करना चाहती थी
वो लाख रुकावटों के बाद भी
आगे बढ़ना चाहती थी
ज़िन्दगी के वो खुशनुमा पल
वापिस लाना चाहती थी
दुनिया की भीड़ से दूर
अकेलापन चाहती थी
वो बड़े होने का बोझ
अपने कंधों से हटाना चाहती थी
वो अपने बचपन की मासूमियत को
अपने चेहरे पर लाना चाहती थी
वो अपनी भागती हुई ज़िंदगी को
थामना चाहती थी
बस अपने उज्ज्वल भविष्य की
कामना चाहती थी
वो दुनिया से परे
अपनी एक पहचान बनाना चाहती थी
वो अपनी काबिलियत से
नाम कमाना चाहती थी
वो तन से नहीं,
मन से सुन्दर दिखना चाहती थी
मैं और मेरी कलम,
बस लिखना चाहती थी!
