STORYMIRROR

Palak Inde

Others

4  

Palak Inde

Others

चाहत

चाहत

1 min
344

वो पहरेदारी के दौर में

आज़ादी चाहती थी

सब बंदिशें तोड़

वो बेबाकी चाहती थी

वो बिना किसी रोक टोक के

खुलकर हँसना चाहती थी

बिना छुपे किसी से

वो जी भर रोना चाहती थी

बिना किसी के डर के

वो दिल की बात रखना चाहती थी

एक बड़े से आँगन में

अपना एक कोना चाहती थी

उसकी आँखों में बहुत से ख्वाब थे

जिन्हें वो साकार करना चाहती थी

दिल में उसके, बहुत ख्वाहिशें कैद थीं

जिन्हें वो आज़ाद करना चाहती थी

वो अपने आँसूओं को 

ताकत बनाना चाहती थी

अपने शोंक को 

अपनी आदत बनाना चाहती थी

ज़िम्मेदारी के माहौल में

खुल कर जीना चाहती थी

ज़्यादा नहीं, बस थोड़ी सी

थोड़ी सी तारीफ चाहती थी

वो रोज़ मिलती डाँट को

अनसुना करना चाहती थी

वो लाख रुकावटों के बाद भी

आगे बढ़ना चाहती थी

ज़िन्दगी के वो खुशनुमा पल

वापिस लाना चाहती थी

दुनिया की भीड़ से दूर

अकेलापन चाहती थी

वो बड़े होने का बोझ

अपने कंधों से हटाना चाहती थी

वो अपने बचपन की मासूमियत को

अपने चेहरे पर लाना चाहती थी

वो अपनी भागती हुई ज़िंदगी को

थामना चाहती थी

बस अपने उज्ज्वल भविष्य की

कामना चाहती थी

वो दुनिया से परे 

अपनी एक पहचान बनाना चाहती थी

वो अपनी काबिलियत से

नाम कमाना चाहती थी

वो तन से नहीं,

मन से सुन्दर दिखना चाहती थी

मैं और मेरी कलम, 

बस लिखना चाहती थी!



Rate this content
Log in