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गीता गुप्ता 'मन'

Others

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गीता गुप्ता 'मन'

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बसन्त

बसन्त

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पात झड़े पीत पीत

हवा चले गाये गीत

मिलते बिछड़े मीत

बासन्ती बयार है।


धूप का है तेज बढ़ा

प्रकृति में रंग चढ़ा

खिले है सुन्दर पुष्प

 छा गयी बहार है।


नव पात नव रूप

धरा बदले स्वरूप

नव कोंपल अनूप

ख़ुशी का संसार है।


दुःख आया सुख लाया

हृदय से अपनाया

पतझड़ या बसन्त

सब स्वीकार है।


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