मनभावन बसन्त
मनभावन बसन्त
1 min
234
खिल अनगिनत फूल
धरा वरण दुकूल
आयी ऋतु सुवास
कलरव विहग आस
उर में विरह पीर
प्रियतम बिनु अधीर
शुभ सुह्रद ऋतुराज
बजते प्रकृति साज
चलती मलय वात
स्वप्निल धवल रात
कोकिल मधुर गीत
होकर नित अभीत
करते अलि मधुपान
नव शुचि उपमान
खिले पुष्प नवरंग
मन में भरकर उमंग।
