◆ बरगद की छांव ◆
◆ बरगद की छांव ◆
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दूर होते जा रहे हैं हम सब आज
उस बूढ़े बरगद की प्यारी छांव से,
अंगुली पकड़कर जिसने हमको
जीवन का पहला सबक सिखाया,
सीखा था जिससे कहकहे लगाना,
ठंढी, शीतल सी छतनार ठांव से,
पढ़ा था जिससे ककहरा जीवन का,
बढ़ गए उस बुजुर्ग से हाथ छुड़ाकर,
खुश हो जाया करता था कभी वो,
जिन नन्हें- मुन्नों को सीने से लगाकर,
देखता वो चुपचाप रहा ,अपने सामने
उन्हीं बच्चों को स्वयं से दूर जाते हुए,
मत भूलो तुम बूढ़े बरगद के दर्द को
वह दर्द भी तुम्हारे संरक्षण के लिए है,
खड़ा है आज भी वो इसी इंतज़ार में ,
देख सके फिर आते हुए अपने अक्स को।
