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Sujata Kale

Others

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Sujata Kale

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बन फूल

बन फूल

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वह सिमटती हुई 

दुधिया - सी

कोहरे की शाल से,

चेहरे पर छाए

केशों के बादल...

 

उसकी महक से

धुंद भी महकने लगती है,

उसकी रोशनी 

बिछ जाती है चारों ओर

चाँदनी सी...


हवा भी रूख बदलकर 

आ जाती है उसकी ओर,

उसकी महक से 

महक भी महकने 

लगती है...

 

वह सिमटती हुई

दुधिया - सी बन का फूल

बन फूल...


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